प्राचीन काल से पूरे विश्व में शिक्षा का भंडार के नाम से जाने वाले राज्य बिहार...!!
देश की अर्थव्यवस्था के लिए मजदूरों का रीड हड्डी कहे जाने वाले राज्य बिहार..
आज वही मगध बिहार वर्तमान स्थिति में शिक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, मजदूरी को लेकर स्थिति इस कदर खराब है कि....!!!
खासकर मजदूरों की......
पूरे भारत में बिहार के मजदूर को प्रवासी मजदूर के रूप में जानते हैं...आखिर क्यो ??
यह कहानी उन मजदूरों की है। जो दूसरे राज्यों में रहकर आधा पेट खाना खा के अपने परिवार को खुशी देते हैं।
जब बिहार के किसी दिहाड़ी मजदुर काम करने के लिए पंजाब,दिल्ली ,हरियाणा ,राजस्थान व अन्य राज्य...मे जाते है। तो जाने से पहले उनके मुख से यही सबाल निकलता है.."नुनु हम जाय छियौ बाहर कंबेयले सब माय पुत ठिक से रहिये" बड़ा अजीब सा लग रहा होगा। सुनने में...
लेकिन सच्चाई यही है।
इन लोगों का भी एक तमन्ना होता है कि 300रु ही कमाए मगर अपने राज्य में ही रहकर परिवार के साथ समय बिताऐ.... लेकिन क्या फायदा सोचने का..!!
इन लोगो का भी मन नहीं होता है कि अपने परिवार को छोड़कर दूसरे राज्य में काम करने के लिए जाए। लेकिन क्या करें? बच्चे की अच्छे शिक्षा व नोन रोटी का सबाल है। जाना तो पड़ेगा ही..!!
हर दिन बिहारी मजदूर रेलगाड़ियों में, बसों में, भुसा की तरह ठुस ठुस के दूसरे राज्य काम करने के लिए जाते हैं। आखिर क्या वजह है। जो अपने राज्यों में काम नहीं मिल पाते हैं..
आखिर क्यों दूसरे राज्य पर निर्भर रहते हैं। वहां काम मिलेगा तो जाएंगे..
कभी कभी तो हमको ऐसा लगता है बिहार के मजदूरों पर एक श्राप कहे या कलंक सा लग चुका है।
लाॅक डाउन के पीरियड में पूरे भारतवासी ने देखा होगा। किस तरह बिहारी मजदूर जब दूसरे राज्य में जीवन खतरे मे दिखाई दिया तो पैदल ही चलने पर मजबूर हो गए। जबकि उन्हें यह भी पता नहीं था कि कैसे और कब घर पहुंचेंगे। वो लोग तो बस इतना जानते थे कि अपने गांव जाना है। जिस शहर को बनाने के लिए वह लोग गांव से शहर गए... पर वही शहर वाले उन्हें भगाने के पीछे पड़ गए।
तब अंत में जाकर उन लोगों ने सोचा इस पराए शहर में भूखों मरने से बेहतर है, की घर जाने के रास्ते में ही मर जाए। किसी ने साइकिल खरीदी तो.. किसी ने अपने बीवी-बच्चों समेत पैदल ही निकल पड़े। बाद में जब श्रमिक ट्रेन चलाई जाने लगी तो.. जो जो लोग पढ़े-लिखे थे उन्होंने सरकारी प्रावधानों के तहत दौड़-धूप कर ट्रेनों में जगह पा ली.. लेकिन ट्रेन की सवारी के लिए की गई व्यवस्था पर जिन्हें भरोसा न था। या फिर काफी प्रयास के बाद भी जिनके लिए नतीजा असफल रहा वे पैदल ही चल दिए। इसी के मद्देनजर सरकार ने तरह-तरह की घोषणाएं किए। बिहार में ही मनरेगा के तहत सभी मजदूरों को काम मिल जाएगा। किसी भी मजदूर को दूसरा जाने की कोई जरूरत नहीं होगी।
बाद में पता चला कि लाॅक डाउन हटते ही फिर से वही सिलसिला.......
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आलेख:- सुमन सौरब .......


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