आज बैठे-बैठे अचानक गूगल पर टाइप कर दिए "दिनकर विश्वविद्यालय" बस उद्देश्य ये था कि विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ इनपुट बाहर आ जाए। पता चला नीचे रिजल्ट में पटना विश्वविद्यालय का नाम आ गया। नीचे खूब स्क्रोल किया बावजूद भी कुछ नहीं मिला।
अब गूगल के रिजल्ट में "दिनकर विश्वविद्यालय" क्यों नहीं मिला इसका जवाब तो मेरे पास नहीं है। लेकिन, हम यह उम्मीद जरूर कर रहे हैं कि हमारे आने वाली पीढ़ी अगर 50 - 60 साल बाद गूगल पर टाइप करेंगे तो 10GB के स्पीड से रिजल्ट आ जाएगा। दिनकर जी के निधन के करीब 49 साल होने वाले हैं। और हमने दिनकर जी के मरणोपरांत उनकी यादें में क्या-क्या किया? चलिए छोड़िए..
मेरे साथ घटित एक कहानी आपको बतलाता हूं। ज्यादा पुरानी नहीं है बस 4 साल पीछे की बात है। मैं आईटीआई का एग्जाम देने के लिए हाजीपुर जा रहा था। अपने बरौनी से दिन के करीब 12:00 टाटा कटिहार लिंक एक्सप्रेस पर चढ़ा। ( उस वक्त यह ट्रेन चलती थी।) जब समस्तीपुर पहुंचे चढ़ने में एक युवक के साथ धक्का-मुक्की हो गई। सीट लूटने को लेकर. वह भाई साहब भी परीक्षा देने जा रहे थे। फिर कुछ देर बाद यह मारपीट दोस्ती में बदल गई।
उसने पूछा कहां से हो भाई.. मैंने विनम्रता पूर्ण उत्तर देते हुए कहा "दिनकर की धरती" बेगूसराय से हूं। फिर मैंने पूछा आप कहां से हो भाई.. उसने कहा - मैं मोतिहारी से हूं लेकिन रिश्तेदार के यहां आकर समस्तीपुर से जा रहा हूं। फिर तुरंत उसने एक प्रश्न पूछ दिया। और बोला - मैं भी सोच रहा था एक बार दिनकर जी का गांव देख लूं.. लेकिन कोई सीधी ट्रेन नहीं है इसीलिए बार-बार प्लान कैंसिल कर देता हूं। मैंने बोला - भाई आप आराम से बरौनी जं उतर जाइए और वहां से ऑटो लेकर दिनकर जी के गांव पहुंच जाइए।
फिर उसने बोला - क्या कोई दिनकर जी के नाम से स्टेशन नहीं है क्या? मैंने बोला हां है लेकिन हॉल्ट टाइप का है। फिर उसने बहाना बनाते हुए कहा - अगर ट्रेन दिनकर ग्राम स्टेशन पर रूकती तो शायद चले जाते ऐसे...बोलते बोलते चुप हो गया। फिर मेरे को यह बात चूभ गई। अब क्यों चूभी इसका पता मुझे नहीं है?
जब आप NH -31 और NH- 28 की मिलन समारोह यानी जीरो माइल के पास जाएंगे तो वहां पर आपको एक दिनकर जी की शानदार प्रतिमा दिखेगी। जानते हैं वहां पर क्यों है, शायद इसलिए ताकि बिहार के विभिन्न जिलों से लोग अगर इस रास्ते से गुजर रहे होंगे तो मूर्ति को देखते ही उसे पता चल जाए कि हम बेगूसराय पहुंच गए। यह तो बेगूसराय वासियों के लिए गर्व की बात है। लेकिन, सच्चाई यह भी है कि अभी भी मूर्ति धूल कनों से भरा हुआ है। प्रतिमा के नीचे दिनकर जी की कुछ लाइनें लिखी तो है लेकिन दिखाई नहीं दे रहा है। शानदार बगीचा तो बनाया गया है लेकिन सुरक्षा के लिए कोई नहीं है। शानदार लाइट तो लगी है लेकिन...
जब से मैं सोशल मीडिया पर एक्टिव हूं। तब से कई बार सोशल मीडिया के माध्यम से ही विश्वविद्यालय की मांगे उठते देख रहा हूं। हालांकि, कुछ छिटपुट आंदोलन भी हुई. राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा जी भी इस मुद्दे को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री तक चिट्ठी लिख चुके है। कई बार तो ट्विटर पर भी #MithilaWantsDinkarUniversity और #BegusaraiWantsDinkarUniversity का कैंपेन चलाया जा चुका है। बावजूद भी इसका कोई फल नहीं मिल सका....अब क्यों नहीं मिल रहा है इसका जवाब मेरे पास नहीं है?
फिर मैं खुद से सवाल पूछता हूं हम बेगूसराय वासी होकर भी दिनकर जी के लिए क्या किए? न ही भव्य प्रतिमा स्थापना करवा पाए.. न ही अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाली ट्रेन को रुकने वाली स्टेशन का स्थापना करवा पाए। न ही राष्ट्र कवि दिनकर जी के नाम से कोई सड़क का स्थापना (सड़क का नाम) करवा पाए। विश्वविद्यालय तो अभी ऑनलाइन प्रक्रिया में ही है।
एक एशिया प्रसिद्ध कावर झील भी है उसे "राम साइट सागर" तो घोषित कर दिया। बस इतना ही.. खैर अब मेरे दिमाग में कुछ नहीं आ रहा है।


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