जो मजदूर हुआ करता था कभी ,
वह आज मजबूर हो गया |
रोजगार भी अब उनसे कोसों दूर हो गया
सरहद तो लांघी है अमीरों ने ही सारी भला |
इसमें गरीबों क्या कसूर हो गया |
स्वाभिमान से जीता था जो शख्स
वो आज दोनों हाथ फैलाने पर मजबूर हो गया |
जिंदगी की खातिर जो कभी सुबह उड़ता करता था
अब घर का पिंजरा ही उसका दस्तूर हो गया |
जिस घर के खातिर निकला था शहर की ओर
वहां से लौटना भी अब घर को मंजूर हो गया |
बड़ी ही शिद्दत से हमने पहुंचाया था प्रकृति को नुकसान |
आज उसी का सजा है कि इंसान इंसान से दूर हो गया |
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By:-.........
Avnish Sachin.......✍🏻

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