नदियां तो बच गई. वृक्ष भी बच गए. मगर गांव को कौन बचाएगा.


एक बार फिर देश में जनसंख्या की गणना शुरू होने वाली है.और यही सबसे उचित समय है. जब हम गंभीरता के साथ अपने गांवों के बारे में सोच सकते हैं. लगातार बढ़ते शहरी क्षेत्रों ने एक-एक करके गांवों की समाप्ति शुरू कर दि है. सच तो यही है.कि अगर हम समय रहते सचेत नहीं हुए तो जिस तरह से हमें अपनी नदियों और जंगलों को बचाने के लिए योजना लगानी पड़ रही है.ठीक उसी तरह हमें अपने गांवों को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा.

 ग्रामीण युवक रोजगार की तलाश में पलायन शहरों की तरफ कर रहे हैं. इस बात पर तो बहस होती ही नहीं कि आखिर शहरों की सीमाएं फैलती क्यों जा रही है.और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे है.तो फिर हमारी खेती-बारी का क्या होगा.

सच तो यह है कि अपनी नदियों जल तथा वृक्ष के प्रति हमारी अनदेखी पहले से चुनौती बढ़ा रखी है.जितना कि हमें नहीं होना चाहिए. ऐसे में गांवों के खत्म होने को लेकर सामने आ रहे तथ्य हमें नई चुनौतियों से रूबरू करा रहे हैं. ये वही गांव हैं.जिसकी तरफ हम अपनी संस्कृति, परंपराओं, संस्कारों और सामाजिक कार्य के लिए आज भी जाने जाते हैं.ये वही गांव हैं.जहां ‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हैै. ये वही गांव हैं जो बरास्ते कृषि भारत की विशाल जनसंख्या का पेट भरने का काम करते हैं.

गांवों के खत्म हो जाने का मतलब है.कृषि का भी अंत हो जाना. नतीजा यह कि खेती वाली जमीनों के भाव बढ़ते जा रहे हैं.हमें यह बेहतर ढंग से समझना होगा कि यदि गांवों को बचाने के लिए कोई मुहिम नहीं चली तो हम अपनी कई जरूरी चीजों के साथ-साथ कृषि से भी हाथ धो बैठेंगे.

युवा रिपोर्टर:- 👇

  :-  सुमन सौरब ✍🏻

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